मैंने मंदिर में जाना छोड़ दिया ... प्रभु का ध्यान लगाना छोड़ दिया
माया के मायाजाल में फस कर ... संस्कृति को निभाना छोड़ दिया
जिन उत्सव और त्योहारों की ... हर वर्ष तका करते थे राह
वो आकर अब चले जाते हैं ... गुम हो गयी है उनकी अब चाह
जाने किसे पीछे पीछे ... भाग रहा हू आंखे मीचे
इतना कुछ पाकर जीवन में भी ... कुछ दूंढ़ रहा हू बाहें भीचे
जब कलम उठाई वो बोल उठी ... तुम मुझको क्यूँ थे भूल गए ?
मै तो हू अंतर्मन की साथिन ... नित देती तुमको मुकाम नए !
तुम बस अब मेरे साथ चलो ... मन में लेकर खुशियों का घेरा
जब दिल की सुन लेता हैं मन ... तब जीवन में हो एक नया सवेरा
माया के मायाजाल में फस कर ... संस्कृति को निभाना छोड़ दिया
जिन उत्सव और त्योहारों की ... हर वर्ष तका करते थे राह
वो आकर अब चले जाते हैं ... गुम हो गयी है उनकी अब चाह
जाने किसे पीछे पीछे ... भाग रहा हू आंखे मीचे
इतना कुछ पाकर जीवन में भी ... कुछ दूंढ़ रहा हू बाहें भीचे
जब कलम उठाई वो बोल उठी ... तुम मुझको क्यूँ थे भूल गए ?
मै तो हू अंतर्मन की साथिन ... नित देती तुमको मुकाम नए !
तुम बस अब मेरे साथ चलो ... मन में लेकर खुशियों का घेरा
जब दिल की सुन लेता हैं मन ... तब जीवन में हो एक नया सवेरा